अमेरिकी आयात शुल्क की उम्मीदों ने तांबे की कीमतों को सहारा दिया और धातु की खेप अमेरिका की ओर खींची। लेकिन नीति पर स्पष्ट प्रगति न होने से कारोबारी इस तेजी के टिके रहने को लेकर कम आश्वस्त हैं। अगर टैरिफ लागू नहीं होते, तो व्यापार प्रवाह और उससे जुड़ी बाजार पोज़िशन पलट सकती हैं।
अमेरिकी प्रीमियम से तांबे की खेप का रुख बदला
कई महीनों से न्यूयॉर्क में तांबे के वायदा भाव लंदन मेटल एक्सचेंज (LME) के बेंचमार्क से ऊपर रहे हैं। इस प्रीमियम ने कारोबारियों को तांबा अमेरिका भेजने के लिए प्रोत्साहित किया—टैरिफ लागू होने से पहले भी यह सौदा लाभदायक था। इस तरह, शुल्क की आशंका ने बाजार की धारणा के साथ-साथ अलग-अलग क्षेत्रों के बीच धातु की वास्तविक आवाजाही को भी प्रभावित किया।
अमेरिका को लगातार बढ़ते आयात से अन्य बाजारों में उपलब्ध भंडार घटा है। कम होती इन्वेंटरी ने आपूर्ति तंग पड़ने की चिंता बढ़ाई और LME कीमतों को सहारा दिया। आयात, भंडार में गिरावट और ऊंची कीमतों ने एक-दूसरे को बल दिया। पिछले महीने LME में तांबा कुछ समय के लिए लगभग 15,000 डॉलर प्रति टन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा था।
टैरिफ पर फैसला टलने से तेजी की परीक्षा
अमेरिकी शुल्क लागू होने की उम्मीद तांबे की तेजी का एक अहम आधार रही है। फैसला न होने के बीच निवेशक सवाल उठा रहे हैं कि टैरिफ की आशंका में अमेरिका भेजा गया तांबा और न्यूयॉर्क तथा लंदन के भावों के बीच बढ़ता अंतर, नीति लागू न होने की स्थिति में कीमतों को कितना सहारा दे पाएंगे। तेज गिरावट की आशंका भी बढ़ी है।
कारोबारियों की नजर अब सिर्फ इस बात पर नहीं है कि टैरिफ लागू होंगे या नहीं। वे यह भी देख रहे हैं कि नीति की उम्मीदें अमेरिकी आयात की रफ्तार, न्यूयॉर्क और लंदन के भावों के अंतर तथा अमेरिका के बाहर के भंडार को कैसे प्रभावित करती हैं। फिलहाल न्यूयॉर्क वायदा LME बेंचमार्क से प्रीमियम पर है, अमेरिका का आयात बढ़ा है और अन्य बाजारों के भंडार घटे हैं। टैरिफ पर फैसला अब भी लंबित है, इसलिए बाजार को यह जोखिम तौलना है कि तांबे की खेप का रुख बदलने के पीछे की उम्मीदें अंततः नीति में बदलेंगी या नहीं।