अल्ट्रामैराथन धावक डीन कर्नाज़ेस ने 2005 में लगातार 80 घंटे 44 मिनट दौड़कर 350 मील (करीब 563 किलोमीटर) पूरे किए। लगातार दौड़ने की सबसे लंबी दूरी का उनका यह रिकॉर्ड अब तक कायम है। इस अनुभव से उनकी सीख है कि कठिन लक्ष्य में कामयाबी का पैमाना गति या स्थान नहीं, बल्कि फिनिश लाइन तक पहुंचना हो सकता है—और रफ्तार कम करना भी आगे बढ़ने का हिस्सा है।
कर्नाज़ेस 30 साल से अधिक समय से दौड़ रहे हैं। वह 50 दिनों में अमेरिका के सभी 50 राज्यों में मैराथन पूरी कर चुके हैं और गर्मियों के चरम में डेथ वैली पार कर चुके हैं। इन अनुभवों ने उनकी धीरज-दौड़ की सोच को आकार दिया: यात्रा के अनुभव पर ध्यान दें, लेकिन मुख्य लक्ष्य पोडियम नहीं, फिनिश लाइन रखें।
350 मील की दौड़ का लक्ष्य
कर्नाज़ेस ने बताया है कि 350 मील की दौड़ पूरी करने के बाद उन्हें कुछ निराशा हुई थी, क्योंकि उनका मूल लक्ष्य 500 मील तक पहुंचना था। 2005 में उन्होंने बिना रुके 80 घंटे 44 मिनट दौड़कर 350 मील पूरे किए।
इस दौरान वह करीब तीन दिन तक सोए नहीं और आखिर में उन्हें मतिभ्रम होने लगा। एक समय उन्हें ऐसा महसूस हुआ मानो वह अपने शरीर से बाहर निकलकर खुद को ऊपर से देख रहे हों।
कर्नाज़ेस के मुताबिक, चेतना की ऐसी बदली हुई अवस्था में हर विचार को नियंत्रित करना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में ध्यान को बार-बार मौजूदा पल पर वापस लाना होता है। वह इस अनुभव के बावजूद दौड़ते रहे, लेकिन दौड़ने की प्रेरणा की बात करते हुए रिकॉर्ड या बाहरी रैंकिंग की तुलना में व्यक्तिगत अनुभव को अधिक अहमियत देते हैं।
जीत ही सफलता का एकमात्र पैमाना नहीं
कर्नाज़ेस कई बार पोडियम पर पहुंच चुके हैं, लेकिन उनका कहना है कि जीतने के लिए उन्होंने कभी दौड़ शुरू नहीं की। उनका मकसद यह जानना है कि उनका शरीर और मन क्या कर सकते हैं, और रेस के दिन खुद का “सबसे बेहतर रूप” बनना है। उनके लिए पोडियम पर जगह मिलना मुख्य लक्ष्य नहीं, बल्कि अतिरिक्त लाभ है।
इस सोच ने सफलता की उनकी परिभाषा भी बदली है। सैकड़ों मैराथन और अल्ट्रामैराथन के बाद ट्रॉफियां अब उनके दौड़ते रहने की मुख्य वजह नहीं हैं। अल्ट्रामैराथन में नए धावकों के लिए उनकी सलाह है कि शुरुआत में पांच या छह घंटे का समय तय करने के बजाय केवल दौड़ पूरी करने को लक्ष्य बनाएं।
अगर धावक कोर्स बंद होने से पहले फिनिश लाइन पार कर लेता है, तो कर्नाज़ेस इसे चुनौती की सफलता मानते हैं। जोर उपलब्ध समय के भीतर दूरी पूरी करने पर है, न कि दौड़ शुरू होने से पहले खुद पर समय की कठोर सीमा थोपने पर।
रफ्तार घटाना भी आगे बढ़ना है
कर्नाज़ेस मानते हैं कि फिनिश लाइन तक पहुंचने का व्यावहारिक लक्ष्य धावक को अपनी क्षमता नए सिरे से समझने में मदद कर सकता है। चुनौती पूरी करने के बाद उन्हें पता चल सकता है कि वे अपनी शुरुआती उम्मीद से अधिक देर तक टिक सकते हैं और ज्यादा दूरी तय कर सकते हैं।
हालांकि, लगातार आगे बढ़ने के लिए पूरी दौड़ में एक ही रफ्तार बनाए रखना जरूरी नहीं। दर्द या थकान संभालना मुश्किल हो जाए तो उनका सुझाव है कि जरूरत पड़ने पर चलें, गति कम करें और फिर आगे बढ़ें। कठिन दौर गुजरने के बाद धावक संभलकर प्रयास जारी रख सकता है।
दर्द के कारण रुक जाने की आशंका रखने वालों के लिए बात सीधी है: लक्ष्य पूरी दूरी को बिना रुके तेज गति से तय करना जरूरी नहीं। हालात के मुताबिक रफ्तार बदलना भी फिनिश लाइन की ओर बढ़ना है।