अमेरिकी संयुक्त अंतर-एजेंसी टास्क फोर्स 401 (JIATF-401) ने ड्रोन-रोधी तकनीकों के लिए ऐसे अनुबंधों की श्रृंखला शुरू की है, जिनकी कुल अधिकतम सीमा करीब 7 अरब डॉलर है। इनमें ड्रोन का पता लगाने, बिना हथियार के इलेक्ट्रॉनिक रूप से उन्हें बाधित करने और हथियारों से मार गिराने की क्षमताएं शामिल हैं। इससे अमेरिकी सेना और अन्य संघीय एजेंसियां किसी एक प्रणाली पर निर्भर रहने के बजाय अलग-अलग तकनीकों में से चयन कर सकेंगी।
एजेंसियां अपनी जरूरत, परिचालन परिस्थितियों और सामने मौजूद ड्रोन खतरे के आधार पर क्षमता चुन सकेंगी। रक्षा कंपनियों के लिए यह संभावित आपूर्तिकर्ताओं और बाजार का दायरा बढ़ाता है, जबकि सरकारी खरीदारों को अलग-अलग प्रणालियां खरीदने और उन्हें साथ इस्तेमाल करने का विकल्प देता है।
अनुबंधों में सेंसर से लेकर मार गिराने वाले हथियार तक
JIATF-401 ने मंगलवार को इन नए काउंटर-ड्रोन और काउंटर-मानवरहित विमान प्रणालियों के अनुबंधों की घोषणा की। अमेरिकी सेना के अधिग्रहण, लॉजिस्टिक्स और प्रौद्योगिकी मामलों के सहायक सचिव ब्रेंट इंग्राहम ने कहा कि ड्रोन खतरे का कोई एक समाधान नहीं है। इसी वजह से अनुबंध किसी एक खास प्रणाली तक सीमित नहीं रखे गए।
इनमें कई कंपनियों और तकनीकी श्रेणियों की प्रणालियां शामिल हैं: ड्रोन का पता लगाने वाले सेंसर, उन्हें जाम या निष्क्रिय करने वाली गैर-गतिज प्रणालियां और उन्हें निशाना बनाकर गिराने वाले गतिज हथियार। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, आपूर्तिकर्ताओं का दायरा बढ़ने से सैन्य और सरकारी एजेंसियों को भविष्य की खरीद में ज्यादा विकल्प मिलेंगे और किसी एक कंपनी या प्रणाली पर निर्भरता घटेगी।
JIATF-401 के निदेशक ब्रिगेडियर जनरल मैथ्यू रॉस ने एक गोलमेज चर्चा में कहा कि इन अनुबंधों से उन क्षमताओं को अधिक इकाइयों तक पहुंचाना आसान हो सकता है, जिन्हें व्यापक स्तर पर तैनात किए जाने की उम्मीद है। इससे वे प्रणालियां भी रक्षा विभाग से आगे अन्य सरकारी एजेंसियों के लिए उपलब्ध हो सकती हैं, जो पहले मुख्य रूप से रक्षा विभाग तक सीमित थीं।
JIATF-401 सेना के साथ-साथ संघीय, राज्य और स्थानीय एजेंसियों के ड्रोन-रोधी प्रयासों में तालमेल करता है। इसने पेंटागन में पहले इस क्षेत्र की जिम्मेदारी संभालने वाली टीम की जगह ली है।
खरीद मंच सहयोगी देशों के लिए भी खुल रहा है
इस साल की शुरुआत में JIATF-401 ने एक ऐसा ड्रोन खरीद मंच बनाया था, जहां सैन्य इकाइयां और सरकारी एजेंसियां अपनी जरूरत के मुताबिक प्रणालियां चुन सकती हैं। अमेरिका इस मंच को अंतरराष्ट्रीय साझेदारों और सहयोगी देशों के लिए भी खोलने की दिशा में काम कर रहा है। इस महीने ऑस्ट्रेलिया इस मंच के जरिए तकनीक खरीदने वाला पहला सहयोगी देश बना।
करीब 7 अरब डॉलर की राशि अनुबंधों की कुल अधिकतम सीमा है; यह अब तक किया गया खर्च नहीं है। इस व्यवस्था के तहत एजेंसियां बाद में ऑर्डर दे सकती हैं और वास्तविक खरीद उनकी अलग-अलग जरूरतों पर निर्भर करेगी। रक्षा ठेकेदारों के लिए इससे आपूर्ति समझौतों का संभावित बाजार बड़ा होता है। खरीदारों के लिए, कई विक्रेताओं और तकनीकी विकल्पों तक पहुंच से मिशन के अनुसार उपकरणों का संयोजन तैयार करना संभव होता है।
युद्धक्षेत्र की घटनाओं से बढ़ी मांग
यूक्रेन युद्ध ने आधुनिक युद्धक्षेत्र में बड़े पैमाने पर ड्रोन के इस्तेमाल के अनुरूप अपनी क्षमता तेजी से ढालने की अमेरिकी सेना की जरूरत को बढ़ाया है। अन्य हमलों ने भी सुरक्षा में मौजूद कमियों को सामने रखा है। मार्च में कुवैत में शत्रुतापूर्ण ड्रोन हमले में छह अमेरिकी सैनिक मारे गए थे। 2024 में जॉर्डन में हुए ड्रोन हमले में तीन अमेरिकी सैनिकों की मौत हुई थी। उस घटना की जांच में पाया गया कि उस समय अमेरिकी बल इस खतरे के लिए पर्याप्त रूप से तैयार नहीं थे।
सैन्य अधिकारियों का कहना है कि ऐसी कोई एक प्रणाली पहचानना मुश्किल है जिसे बड़े पैमाने पर तैनात करके हर तरह के ड्रोन खतरे से निपटा जा सके। अलग-अलग इकाइयों के मिशन और परिचालन स्थितियां अलग होती हैं। रॉस ने अलास्का स्थित 11वीं एयरबोर्न डिवीजन और 1st Armored Division का उदाहरण देते हुए कहा कि दोनों की ड्रोन-रोधी जरूरतें अलग हैं।
इकाई की जरूरत के मुताबिक बहुस्तरीय सुरक्षा
अमेरिकी अधिकारी ड्रोन-रोधी सुरक्षा को कई स्तरों वाली प्रक्रिया के रूप में देखते हैं। इसमें पहले लक्ष्य का पता लगाया जाता है, फिर स्थिति के अनुसार उसे जाम करने, दबाने या नष्ट करने का फैसला होता है। नए अनुबंधों में शामिल सेंसर, गैर-गतिज प्रणालियां और गतिज हथियार इसी तरह अलग-अलग क्षमताओं को जोड़ने के लिए हैं।
इन अनुबंधों से प्रणालियों की वास्तविक तैनाती होगी या नहीं, यह आगे होने वाली खरीद और प्रत्येक एजेंसी द्वारा उपकरणों को अपनी व्यवस्था में शामिल करने पर निर्भर करेगा। अब तक जारी जानकारी का जोर तकनीकी विकल्पों और आपूर्ति के रास्तों का दायरा बढ़ाने पर है। प्रणालियां अलग-अलग इकाइयों में कैसे बांटी जाएंगी और प्रत्येक क्षमता को कितने बड़े पैमाने पर तैनात किया जाएगा, इसका विवरण अभी सामने नहीं आया है।