यूरोप की रक्षा के प्रति अमेरिका की NATO प्रतिबद्धता कमज़ोर पड़ने से बाल्टिक क्षेत्र में रूस की सैन्य गणना बदल सकती है और यूरोप के साथ संघर्ष के परमाणु टकराव में बदलने का जोखिम बढ़ सकता है। हार्वर्ड केनेडी स्कूल में परमाणु सुरक्षा के शोधकर्ता स्पेंसर वॉरेन ने कहा कि रूस लिथुआनिया, लातविया और एस्टोनिया को संभावित निशाने के रूप में देख सकता है। पारंपरिक युद्ध में रूसी सेना के कमजोर पड़ने पर परमाणु हथियारों के इस्तेमाल की आशंका का आकलन करना और कठिन होगा।
वॉरेन रूस के परमाणु शस्त्रागार और परमाणु हथियारों के इस्तेमाल से जुड़े उसके सिद्धांतों का अध्ययन करते हैं। उनके अनुसार, इनके इस्तेमाल का अंतिम अधिकार राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के पास है। पूर्व सोवियत संघ में अपना प्रभाव क्षेत्र फिर से बनाने की मॉस्को की कोशिश परमाणु प्रतिरोध के जरिए तनाव बढ़ने के जोखिम से जुड़ी है। बाजारों के लिए यह आकलन यूरोप की सुरक्षा व्यवस्था, रक्षा खर्च और परमाणु प्रतिरोध को लेकर अनिश्चितता को रेखांकित करता है। ये सैन्य परिदृश्य विश्लेषण हैं, युद्ध होने की भविष्यवाणी नहीं।
डेनमार्क की खुफिया एजेंसी ने NATO सीमाओं पर जोखिम बताया
डेनमार्क की रक्षा खुफिया सेवा ने हाल में आकलन किया कि रूस की ओर से पड़ोसी NATO देशों में से किसी एक या अधिक पर सीमित सैन्य हमला करने का जोखिम बढ़ रहा है। ऐसा कदम आने वाले महीनों में संभव हो सकता है। एजेंसी के परिदृश्यों में तीन समयसीमाएं दी गई हैं: रूस करीब छह महीने में किसी पड़ोसी के खिलाफ सीमित युद्ध लड़ने में सक्षम हो सकता है; दो साल के भीतर कई बाल्टिक देशों को शामिल करने वाले क्षेत्रीय युद्ध के लिए तैयार हो सकता है; और करीब पांच साल में यूरोपीय महाद्वीप पर बड़े पैमाने का युद्ध लड़ने की क्षमता हासिल कर सकता है।
वॉरेन ने कहा कि यदि रूस यह निष्कर्ष निकाले कि उसे जल्द ही बाल्टिक देशों पर हमला करना चाहिए, तो आने वाले महीनों में उठाए जाने वाले अन्य कदमों पर भी करीबी नजर रखनी होगी—वे क्षेत्रीय संघर्ष के शुरुआती संकेत हो सकते हैं। सोवियत संघ के विघटन के बाद लिथुआनिया, लातविया और एस्टोनिया स्वतंत्र हुए और बाद में NATO में शामिल हुए। उनकी सेनाएं अपेक्षाकृत छोटी हैं और उनकी रक्षा काफी हद तक गठबंधन की सामूहिक सुरक्षा प्रतिबद्धता पर निर्भर करती है।
डेनमार्क के खुफिया अधिकारियों ने यह भी चेताया है कि रूस गलत अनुमान लगा सकता है कि किसी सदस्य पर हमले की स्थिति में NATO सामूहिक जवाब देगा या नहीं। यह जोखिम खासकर तब बढ़ सकता है, जब मॉस्को को लगे कि अमेरिका अपने यूरोपीय सहयोगियों की मदद करने में असमर्थ या अनिच्छुक है। NATO संधि का अनुच्छेद 5 एक सदस्य पर हमले को सभी सदस्यों पर हमला मानता है, लेकिन जवाबी कार्रवाई का फैसला सदस्य देशों के राजनीतिक और सैन्य निर्णयों पर निर्भर करेगा।
पारंपरिक रक्षा और परमाणु तनाव का जोखिम
वॉरेन के मुताबिक, अमेरिका के अलावा NATO के 31 सदस्य पारंपरिक युद्ध की स्थिति में रूस के खिलाफ सामूहिक रक्षा कर सकते हैं। हालांकि, इससे जीत की गारंटी नहीं मिलती और न ही भारी नुकसान से बचाव होता है। उन्होंने नॉर्डिक देशों के आधुनिक विमानों और टैंकों के साथ NATO प्रशिक्षण प्राप्त उनकी सेनाओं का उल्लेख किया। एक अहम सवाल यह है कि क्या रूस बाल्टिक देशों पर तेजी से कब्जा कर पाएगा और यूरोपीय सेनाओं के जवाबी हमले का सामना कर सकेगा।
यदि रूस बाल्टिक क्षेत्र पर जल्दी नियंत्रण हासिल नहीं कर पाता, तो पारंपरिक सैन्य संतुलन उसके खिलाफ जा सकता है। लेकिन यह अनुमान लगाना कठिन है कि युद्ध पारंपरिक हथियारों तक सीमित रहेगा या नहीं। वॉरेन ने कहा कि सैन्य झटका लगने पर या NATO की यूरोपीय सेनाओं के रूसी क्षेत्र—जिसमें कैलिनिनग्राद भी शामिल है—की ओर बढ़ने की आशंका होने पर रूस हार टालने के लिए परमाणु हथियारों के इस्तेमाल का दबाव महसूस कर सकता है। उन्होंने सेंट पीटर्सबर्ग की दिशा को भी रूस के लिए चिंता का संभावित बिंदु बताया।
वॉरेन के अनुसार, रूस और यूरोप के बीच सीधा संघर्ष परमाणु तनाव बढ़ने का गंभीर जोखिम पैदा करेगा। फिर भी मॉस्को परमाणु हथियारों के इस्तेमाल से पीछे हट सकता है, यदि उसे लगे कि इससे अमेरिका युद्ध में शामिल हो जाएगा या फ्रांस कार्रवाई करेगा। वॉरेन दूसरे परिदृश्य को कम संभावित मानते हैं, लेकिन उसे असंभव नहीं बताते। आम तौर पर रूस के परमाणु इस्तेमाल के सिद्धांत को अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस की तुलना में अधिक व्यापक माना जाता है; किसी खास संघर्ष में फैसले क्या होंगे, यह अनिश्चित रहेगा।
पुतिन की चेतावनियां और फ्रांस की परमाणु तैयारी
पुतिन ने हाल में परमाणु संघर्ष के जोखिम पर फिर बात की। उन्होंने कहा कि परमाणु टकराव दुनिया को खाई के किनारे धकेल सकता है और इस बात की कोई गारंटी नहीं कि इन हथियारों का कभी इस्तेमाल नहीं होगा। उन्होंने यह भी कहा कि रूस के पास ऐसी हमलावर क्षमताएं हैं जो दूसरे देशों के पास नहीं हैं। रूस के पास दुनिया के सबसे बड़े रणनीतिक और सामरिक परमाणु शस्त्रागारों में से एक है। उसकी परमाणु सेनाएं बड़ी शक्ति के रूप में उसकी स्थिति का अहम हिस्सा हैं।
पुतिन की हालिया परमाणु चेतावनियों के पांच दिन बाद, फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने ब्रिटनी के तट के पास परमाणु-संचालित पनडुब्बी Le Vigilant से परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम मिसाइल का प्रक्षेपण देखा। मैक्रों ने इस परीक्षण को फ्रांस की परमाणु प्रतिरोधक क्षमता की विश्वसनीयता का अहम प्रदर्शन बताया। फ्रांस अपनी परमाणु सेनाओं का आधुनिकीकरण भी कर रहा है और यूरोपीय सहयोगियों के लिए व्यापक परमाणु सुरक्षा भूमिका पर चर्चा कर रहा है।
Federation of American Scientists के शोधकर्ताओं का अनुमान है कि फ्रांस के पास करीब 290 परमाणु हथियार हैं। इसके अलावा, लगभग 80 सेवामुक्त हथियार नष्ट किए जाने की प्रतीक्षा में हैं, जिससे कुल भंडार करीब 370 बनता है। अप्रैल 2025 में, जब फ्रांस के परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम विमान उत्तरी स्वीडन में तैनात थे, तब स्वीडन में फ्रांस के राजदूत ने कहा था कि फ्रांस की परमाणु सुरक्षा-छतरी स्वीडन समेत सहयोगियों पर भी लागू होती है।
अमेरिका की प्रतिबद्धता में बदलाव होने पर यूरोप अपनी सुरक्षा मजबूत करने के लिए फ्रांस की प्रतिरोधक व्यवस्था पर विचार कर सकता है। हालांकि, इसकी भूमिका राष्ट्रीय नीतियों, सैन्य तैनाती और संकट के दौरान लिए गए फैसलों पर निर्भर करेगी। वॉरेन के अनुसार, यदि लड़ाई पारंपरिक हथियारों तक सीमित रही और रूस बाल्टिक क्षेत्र में उलझा रहा, तो यूरोप को बढ़त मिल सकती है। परमाणु हथियारों का इस्तेमाल होने पर घटनाक्रम उस दायरे से तेजी से बाहर चला जाएगा जिसका पारंपरिक सैन्य परिदृश्य भरोसेमंद आकलन कर सकता है।